दिनेश ठक्कर, सीएमडी, एंजेल ब्रोकिंग :
भारतीय रिजर्व बैंक ने हाल की मौद्रिक समीक्षा में निराश नहीं किया। वास्तव में आरबीआई ने उम्मीद से ज्यादा ही दिया है।
बैंक ने रेपो दर में एक चौथाई फीसदी अंक की कटौती के साथ ही सीआरआर में भी इतनी ही कमी करके चौंका दिया। आरबीआई का नीतिगत जोर अब केवल महँगाई पर काबू पाने के बजाय विकास में सहयोग पर है। मुझे लगता है कि यह एक स्वागतयोग्य कदम है, क्योंकि ब्याज दरों में कमी से अर्थव्यवस्था में निवेश का माहौल बेहतर होगा और सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी विकास दर में भी तेजी आयेगी। मेरा मानना है कि मौद्रिक नीति के जरिये आरबीआई ने अब महँगाई और विकास में संतुलन की नीति अपनायी है, क्योंकि आरबीआई के मुताबिक चालू खाता घाटा और वित्तीय घाटा बढऩे से दरों में आगे कमी की गुंजाइश बहुत कम है।
इन चिंताओं के मद्देनजर मुझे लगता है कि मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में चालू खाते घाटे के जीडीपी के 5.4% के रिकॉर्ड स्तर तक पहुँचना एक बड़ी चिंता है। पटरी पर वापस लौटने की कोशिश करती हमारी अर्थव्यवस्था इस समय रेटिंग घटने जैसे झटके नहीं झेल सकती, क्योंकि हम सीएडी को काबू में रखने के लिए विदेशी निवेश पर काफी हद तक निर्भर हैं। ऐसे में सरकार को वित्तीय घाटा कम करने के लक्ष्य पर ध्यान देना चाहिए। हाल के महीनों में सरकार ने आर्थिक सुधार के मोर्चे पर कई कड़े और बड़े फैसले लिये हैं, जिनसे सुधारों को लागू करने के मुद्दे पर सरकार की विश्वसनीयता बढ़ी है। ऐसे में मुझे उम्मीद है कि सरकार आगामी बजट में वित्तीय अनुशासन पर जोर देगी। मैं उम्मीद करता हूँ कि सरकार लोकसभा चुनाव 15 महीने दूर होने को देखते हुए लोक लुभावन बजट पेश करने के बदले सुधार की गति जारी रखेगी।
बजट में बुनियादी ढाँचे पर जोर होने की उम्मीद है, क्योंकि इस क्षेत्र में निवेश बढ़ाना अब भी प्राथमिकता है। मुझे लगता है कि सरकार को ढाँचागत सुधार तेज करने चाहिए, ताकि अर्थव्यवस्था में आपूर्ति की बाधाएँ दूर हो सकें। इस संदर्भ में कोयला ब्लॉक आवंटन में तुरंत स्पष्टता और खनन की बाधाएँ खत्म करने की जरूरत है। हमारे आयात खर्चों का एक बड़ा हिस्सा तेल और गैस के आयात पर खर्च होता है, जिससे बचा नहीं जा सकता। लेकिन यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि कोयले का बड़ा भंडार होते हुए भी हमें कोयले के आयात पर भी कीमती विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ रही है। वहीं कोयले की कमी से बिजली क्षेत्र में अरबों डॉलर का निवेश प्रभावित हो रहा है। चालू खाते के बढ़ते घाटे को देखते हुए निर्यात क्षेत्र को कुछ रियायतें मिल सकती हैं। साथ ही मुझे लगता है कि बजट में जीएसटी और डीटीसी जैसे लंबे समय से अटके सुधारों को लागू करने पर स्थिति साफ होगी। सरकार की सीधी नकद सब्सिडी योजना में और प्रगति की उम्मीद है।
मुझे नहीं लगता है कि सामाजिक क्षेत्र के मोर्चे पर बजट में नरेगा के अलावा कुछ खास होगा। हालाँकि सरकार खाद्य सुरक्षा को लेकर उत्साहित है, लेकिन मुझे लगता है कि इससे संबंधित कानून बजट के बदले 2014 के आम चुनावों का समय करीब आने पर आयेगा, क्योंकि फिलहाल सब्सिडी के बोझ को कम करना सबसे बड़ी चिंता है।
(निवेश मंथन, फरवरी 2013)