राजेश रपरिया, सलाहकार संपादक :
बजट बनाना किसी भी वित्त मंत्री के लिए हमेशा एक दुष्कर कार्य होता है। भारत जैसे देश में यह कार्य और ज्यादा दुरूह है।
गठबंधन की राजनीति ने बजट निर्माण की मुश्किलों को चरम पर पहुँचा दिया है। पर मौजूदा वित्त मंत्री पी चिदंबरम की दिक्कतों का कोई अंत नहीं है। शायद वे भारत के अकेले वित्त मंत्री होंगे, जिन्हें एक साथ दो बजट से जूझना पड़ रहा है।
सच तो यह है कि वित्त मंत्री को 28 फरवरी 2013 को पेश होने वाले बजट से ज्यादा चालू वित्त वर्ष के लक्ष्यों की चिंता है। वैश्विक आर्थिक कारकों को लेकर उनका संशय में रहना लाजमी है। घरेलू आर्थिक कारकों की अंधेरी सुरंग से बाहर आने के लिए अभी वे जूझ रहे हैं। उनकी बिडंबना ये है कि राजनीति अनिश्चितता और समीकरणों से उनके हाथ बंधे हुए हैं। महँगाई, व्यापार घाटे, ऊँची ब्याज दरों, विकास दर आदि के मोर्चे पर तमाम प्रयासों के बावजूद वित्त मंत्रालय को तनिक भी सफलता नहीं मिल पायी है।
उन्होंने सितंबर 2012 में पुन: यूपीए सरकार के वित्त मंत्री का कार्यभार संभाला। तब से उनकी सारी ऊर्जा और शक्ति मूलत: चालू साल के घाटे को नियंत्रित करने में लगी हुई है। तृणमूल कांग्रेस से दामन छुड़ाने के बाद से सरकारी घाटे को नियंत्रित करने के लिए यूपीए सरकार ने अनेक कदम उठाये हैं। इनमें डीजल और घरेलू गैस की कीमत की वृद्धि जैसे अलोकप्रिय और महँगाई बढ़ाने वाले उपाय शामिल हैं। बजट 2012-13 के अनुमानों में सरकारी घाटे का लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 5.1% पर रखा गया था।
इस लक्ष्य को ध्वस्त करने के बीज बजट दस्तावेज में ही मौजूद थे। मसलन वित्त वर्ष 2012-13 के लिए तेल सब्सिडी के मद में 43,580 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था, जो बीते वित्त वर्ष (2011-12) के तेल सब्सिडी खर्च से 24,901 करोड़ रुपये कम था। यूपीए सरकार की मंशा साफ थी कि तेल उत्पादों की कीमतों में बेहताशा वृद्धि कर वह तेल सब्सिडी के लक्ष्य को हासिल कर लेगी। पर यह बेहद राजनीतिक अपरिपक्वता का निर्णय साबित हुआ। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के चलते इस कीमत वृद्धि के निर्णय में यूपीए ने खुद विलंब किया। वैसे भी तृणमूल कांग्रेस के रहते यूपीए सरकार के लिए ऐसा निर्णय करना असंभव था।
तेल सब्सिडी के इस प्रावधान की रही-सही कसर डॉलर की कीमत की भारी वृद्धि ने पूरी कर दी। ऐसा आकलन है कि डीजल और घरेलू गैस के दामों में हुई वृद्धि से सरकारी घाटे को काबू करने में मामूली लाभ ही मिलेगा। अब वित्त मंत्री ने सरकारी घाटे का नया लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद के 5.3% का रखा है। वित्त मंत्री की पूरी कोशिश है कि अब यह घाटा निर्धारित लक्ष्मण रेखा को नहीं लांघ पाये, वरना अर्थव्यवस्था के 'सीताहरण' का आसन्न खतरा गहरा जायेगा।
अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसियाँ लगातार देश को आगाह कर रही हैं कि यदि भारत ने सरकारी घाटे को काबू में नहीं किया तो उसकी क्रेडिट रेटिंग को घटाया जा सकता है। यूपीए सरकार यह खतरा कदापि नहीं ले सकती है, क्योंकि यूपीए सरकार की विकास गाथा डॉलर की आमद पर टिकी हुई है। वित्त मंत्री की दिक्कत यह है कि राजस्व भी बजट अनुमानों से कम-से-कम 50,000-60,000 करोड़ रुपये कम रहने वाला है। अब उनके सामने एक ही मुफीद विकल्प है कि वे मंत्रालयों के आवंटित धन में कटौती करें। अब यह साफ हो चुका है कि मंत्रालयों के खर्च में से 80,000-1,00,000 करोड़ रुपये की कटौती कर सरकारी घाटे के नये लक्ष्य को हासिल किया जाये। वित्त मंत्री यह अच्छी तरह समझ चुके हैं कि उनके आगामी बजट 2013-14 का मार्ग चालू वित्त वर्ष के प्रदर्शन से ही प्रशस्त होगा।
अब सबकी निगाहें 28 फरवरी पर टिकी हुई हैं कि सरकारी घाटे के घोषित लक्ष्य 4.8% को हासिल करने के लिए वे बजट में क्या उपाय करते हैं - सरकार के व्यय को नियंत्रित करने का रास्ता अख्तियार करते हैं या राजस्व का दुर्गम पथ?
पिछले तीन सालों से बेलगाम सरकारी घाटे ने महँगाई को बेकाबू कर दिया है। इससे महँगाई पर काबू पाने के आरबीआई के सारे प्रयास निष्फल हो गये और विकास दर की नियति तिमाही-दर-तिमाही गिरने की हो गयी है। यदि वित्त मंत्री सरकारी घाटे को साध लें तो महँगाई, व्यापार घाटे और विकास दर को अपेक्षित स्तर पर लाने के दरवाजे खुद-ब-खुद खुल जायेंगे। ठ्ठ
(निवेश मंथन, फरवरी 2013)