राजीव रंजन झा
सरकार और टेलीकॉम क्षेत्र के नियामक ने सोने की मुर्गी को एक बार में काटने का मन बना लिया है। लगता है कि 3जी के उदाहरण से उन्होंने कोई सबक नहीं लिया है। इतना समय बीत गया है 3जी सेवाओं के शुरू होने के बाद, लेकिन इन सेवाओं को किसी नजरिये से सफल नहीं कहा जा सकता। न तो ये सेवाएँ ज्यादा ग्राहकों को खींचने में सफल हो पायी हैं, न ही कंपनियों के लिए अच्छी कमाई का जरिया बन पायी हैं। मैंने 3जी नीलामी के बीच ही 27 अप्रैल 2010 को लिखा था, ‘क्या भारत में 3जी मोबाइल सेवाएँ शुरू होने से पहले ही नाकामी के लिए अभिशप्त हो गयी हैं? 3जी स्पेक्ट्रम के लिए बेहिसाब ऊँचे स्तरों की बोलियों से कुछ ऐसा ही डर लगने लगा है।‘ आज बिल्कुल वैसा ही होता दिख रहा है।
और अब 3जी से भी कई गुना ज्यादा ऊँची कीमतों पर 2जी स्पेक्ट्रम की बोली लगाने की मजबूरी टेलीकॉम कंपनियों को झेलनी पड़ेगी। जब सर्वोच्च न्यायालय ने 122 लाइसेंस रद्द करने का फैसला सुनाया था तो माना जा रहा था कि इससे पुरानी टेलीकॉम कंपनियों को फायदा मिलेगा, क्योंकि उन्हें यह स्पेक्ट्रम 3जी की तुलना में कम कीमत पर उपलब्ध होगा। लेकिन टीआरएआई की ताजा सिफारिशें इन उम्मीदों से एकदम उल्टी हैं। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के मद्देनजर यह उम्मीद भी नहीं की जा सकती कि टीआरएआई की इन सिफारिशों को सरकार दरकिनार कर सकती है।
एक तरफ टीआरएआई ने स्पेक्ट्रम की बोली के लिए आधार मूल्य या सुरक्षित मूल्य (रिजर्व प्राइस) काफी ऊँचा रखा है, तो दूसरी ओर इस कारोबारी साल में केवल 5 मेगाहट्र्ज स्पेक्ट्रम की नीलामी करने की बात कही गयी है। यानी 122 लाइसेंसों के रद्द होने से काफी स्पेक्ट्रम खाली होने के बावजूद इसका कृत्रिम अभाव पैदा किया जा रहा है। इससे पहले 3जी नीलामी के समय भी यही तरकीब अपनायी गयी थी, जिससे नीलामी की प्रक्रिया बिल्कुल पारदर्शी होने के बावजूद बोलियाँ काफी ऊँची चली गयी थीं। उन्हीं ऊँची बोलियों को आधार बना कर अब नयी बोलियाँ मँगाना और उसमें भी फिर से कृत्रिम अभाव पैदा करना साफ दिखाता है कि सरकार अब टेलीकॉम क्षेत्र को दुधारू गाय नहीं, बल्कि सोने के अंडे देने वाली मुर्गी मान रही है और वह सारे अंडे एक साथ निकाल लेने के लिए इस मुर्गी को काटने पर उतारू है। आप कहेंगे कि सिफारिशें तो टीआरएआई की हैं, मैंने सरकार का नाम क्यों लिया! बंधु, सरकार सर्वव्यापी है!
हम ऐसी स्थिति की ओर जा रहे हैं, जिसमें टेलीकॉम क्षेत्र की कंपनियों का कारोबार संकट में फँसेगा, शेयरधारकों को नुकसान होगा और ग्राहकों को इन सेवाओं के लिए ज्यादा कीमतें चुकानी पड़ेंगी। फायदा दिखेगा तो केवल भारत सरकार को, जिसके खजाने में ज्यादा पैसा जायेगा। लेकिन यह केवल शुरुआत में होगा। अगर सोने के अंडे देने वाली मुर्गी हलाल हो गयी तो रोज-रोज सोने के अंडे नहीं मिलेंगे।
क्या हैं टीआरएआई की सिफारिशें :
- स्पेक्ट्रम की नीलामी 1.25 मेगाहट्र्ज के ब्लॉक में होंगी। हर नीलामी में कम-से-कम 5 मेगाहट्र्ज स्पेक्ट्रम रखा जायेगा। नीलामी कई भागों में होगी।
- सबसे पहले 1800 मेगाहट्र्ज बैंड में 5 मेगाहट्र्ज की नीलामी जितनी जल्दी संभव हो
- स्पेक्ट्रम में वे सभी कंपनियाँ हिस्सा ले सकेंगी, जिनके पास सेलुलर मोबाइल, यूएसएस या यूनिफाइड लाइसेंस है या जो यूनिफाइड लाइसेंस पाने की पात्रता रखती हैं।
- स्पेक्ट्रम रीफार्मिंग करके 900 मेगाहट्र्ज के बैंड में स्पेक्ट्रम रखने वाली कंपनियों को पुराने स्पेक्ट्रम के बदले 1800 मेगाहट्र्ज का नया स्पेक्ट्रम दिया जायेगा। इसी तरह 800 मेगाहट्र्ज के बैंड में मिले स्पेक्ट्रम को बदल कर 1900 मेगाहट्र्ज बैंड का स्पेक्ट्रम दिया जायेगा।
- नीलामी से मिले स्पेक्ट्रम को कंपनियाँ किसी भी तकनीक के जरिये किसी भी सेवा के लिए इस्तेमाल कर सकेंगी।
- किसी खास बैंड में एक नीलामी की अंतिम बोली अगली बोली के लिए आधार मूल्य बन जायेगी। अगर अगली बोली साल भर के अंतराल के बाद हो तो आधार मूल्य को उसके अनुरूप संशोधित किया जायेगा।
- किसी एक सर्किल में स्पेक्ट्रम हासिल करने की सीमा हर बैंड में दिये जा रहे स्पेक्ट्रम का 50% होगी। साथ ही सभी सर्किलों में सभी बैंड में दिये जा रहे स्पेक्ट्रम का 25% से ज्यादा लेने पर भी रोक होगी।
- जिन कंपनियों के पास केवल नीलामी के जरिये मिला स्पेक्ट्रम होगा, उन्हें अपनी समायोजित सकल आय (ऐडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू) का 1% हिस्सा स्पेक्ट्रम यूसेज चार्ज के रूप में देना होगा। जिनके पास नीलामी के साथ मिले स्पेक्ट्रम के अलावा प्रशासनिक तौर पर दिया गया (यानी लाइसेंस के साथ मिला) स्पेक्ट्रम भी होगा, उन्हें मौजूदा (ऊँची) दर से ही यूसेज चार्ज देना होगा।
क्यों परेशान हैं टेलीकॉम कंपनियाँ
- कंपनियों के मुताबिक 1800 मेगाहट्रर्ज बैंड के 5 मेगाहटर्ज के लिए आरक्षित मूल्य करीब 18,100 करोड़ रुपये ठहरेगा, जो काफी ज्यादा है।
- कंपनियों का कहना है कि 2जी स्पेक्ट्रम की कीमत 3जी स्पेक्ट्रम से चार गुना महँगी होगी। वहीं 2008 में बाँटे गये स्पेक्ट्रम से तुलना करें तो यह आरक्षित मूल्य उससे 10 गुना महँगा है।
- जानकारों के मुताबिक ये सिफारिशें इसी रूप में लागू हो गयीं तो भारती एयरटेल पर अगले 10 साल में करीब 7,800 करोड़ रुपये और आइडिया पर 5,600 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा।
- टेलीकॉम कंपनियाँ चेतावनी दे रही हैं कि ट्राई की सिफारिशें बिना किसी बदलाव के लागू होने पर कॉल दरों में 30% तक की बढ़ोतरी हो सकती है।
पिट गये टेलीकॉम शेयर
- टीआरएआई की सिफारिशें 23 अप्रैल 2012 को आयी थीं। उस दिन भारती एयरटेल का शेयर 4.2% गिर कर 299 रुपये पर आ गया। रिलायंस कम्युनिकेशंस का शेयर करीब 2% नीचे 79 रुपये पर आ गया और आइडिया का शेयर 3.6% गिर कर 80 रुपये पर आकर टिका।
(निवेश मंथन, मई 2012)