माफ करें, जुर्माना शब्द देख कर कुछ बड़े लोगों को अच्छा नहीं लगेगा क्योंकि उनके हिसाब से यह केवल निपटारा शुल्क (सेट्लमेंट चार्ज) था। लेकिन मीडिया अपने दर्शकों-पाठकों को खबर देते समय किसी वकील की भाषा में नहीं बोलता, उसका असली मतलब समझाता है।
आपको याद दिला दें कि 14 जनवरी 2011 को सेबी ने रिलांयस इन्फ्रा, आरएनआरएल, अनिल अंबानी और एडीए समूह के चार अन्य वरिष्ठ अधिकारियों पर कुल 50 करोड़ रुपये का निपटारा शुल्क लगाया था। आखिर उस समय किन आरोपों को सुलटाने के लिए अनिल अंबानी और उनके समूह के चार वरिष्ठ अधिकारियों ने सेबी से सहमति आदेश (कंसेंट ऑर्डर) की गुजारिश की थी? सेबी का सहमति आदेश आने के बाद तब इस मामले की ज्यादा परतें नहीं खुल पायी थीं।
लेकिन अब यूके के शेयर बाजार के नियामक फाइनेंशियल सर्विसेज अथॉरिटी (एफएसए) की तरफ से यही किस्सा फिर से सामने आ गया है। वहाँ इसकी ज्यादा परतें खुल पायी हैं। यूके में एक ट्रिब्यूनल की कार्रवाई के दौरान यह बात सामने आयी है कि प्लूरी इमर्जिंग कंपनीज नाम से मॉरीशस में एक इकाई बनायी गयी थी, जिसका खास मकसद भारतीय शेयरों में निवेश करना था। यह बात भी सामने आ रही है कि प्लूरी के पीछे अनिल अंबानी समूह का पैसा लगा था। कानूनन भारतीय नागरिकों और भारत में पंजीकृत कंपनियों को किसी विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) के माध्यम से भारतीय शेयरों में निवेश करने की अनुमति नहीं है। लेकिन इस मामले में यूबीएस के अधिकारियों ने इस कानून की अनदेखी करके आगे बढऩे का प्रयास किया।
लंदन में यूबीएस के वेल्थ मैनेजमेंट डिवीजन के भारतीय ग्राहकों के पोर्टफोलिओ को संभालने वाले डेस्क के प्रमुख सचिन कर्पे पर एफएसए ने 12.5 पाउंड का जुर्माना लगाया है, जिसे ट्रिब्यूनल में चुनौती दी गयी है। जाहिर है कि इस सुनवाई के दौरान मामले की काफी परतें खुल कर सामने आयेंगी। इससे हमें पता चलेगा कि इस पूरे मामले में क्या-क्या खेल चला था। लेकिन इतना तो साफ है कि विदेशी संस्थागत निवेशकों के नाम पर भारतीय निवेशकों का ही पैसा घूम कर वापस भारतीय शेयर बाजार में आने के अंदेशों को लेकर अब दस्तावेजी सबूत मिल रहे हैं।
मीडिया में अनिल अंबानी समूह के प्रवक्ता ने जो सफाई दी है, उसमें कहीं भी इस मामले को नकारा नहीं गया है। केवल इतना कहा गया है कि यह मामला पाँच साल पुराना है, सेबी में इसे सहमति आदेश के जरिये निपटाया जा चुका है और यूबीएस को जो राशि दी गयी थी, उसे वापस लेकर खाता बंद किया जा चुका है। कहने को और क्या बाकी बचा!
(निवेश मंथन, जनवरी 2012)